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भिक्षुक (Bhikshuk)

bhikshuk beggar
पाठ परिचय

कवि: सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
कविता का स्वर: प्रगतिवादी और यथार्थवादी
सारांश: 'भिक्षुक' कविता में निराला जी ने समाज की अत्यंत हृदयविदारक सच्चाई का यथार्थ चित्रण किया है। इस कविता में एक भूखे और असहाय भिखारी की दयनीय स्थिति का वर्णन है, जो भूख के कारण कमज़ोर हो गया है और लाठी टेकता हुआ रास्ते पर भीख माँग रहा है। उसके साथ उसके दो बच्चे भी हैं जो भूख से तड़प रहे हैं। कवि इस कविता के माध्यम से समाज की संवेदनहीनता और अमीरों-गरीबों के बीच की गहरी खाई पर प्रहार करते हैं और भिक्षुक के दुख को दूर करने का संकल्प लेते हैं।

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

पद्यांश 1: भिक्षुक की दयनीय अवस्था

वह आता—
दो टूक कलेजे के करता, पछताता पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को—भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता—
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।

शब्दार्थ: दो टूक कलेजे के करता = दुख के मारे कलेजे के टुकड़े-टुकड़े होना; लकुटिया टेक = लाठी का सहारा लेकर; झोली = झोला या थैला।

प्रसंग: इस पद्यांश में कवि ने एक कमज़ोर और लाचार भिखारी का मार्मिक चित्रण किया है जो सड़क पर भीख माँगने आ रहा है।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि वह भिखारी सड़क (पथ) पर आ रहा है। उसकी दयनीय और लाचार स्थिति को देखकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के हृदय (कलेजे) के दुख से दो टुकड़े हो जाएँ। वह अपनी इस दुर्दशा पर पछतावा करता हुआ चला आ रहा है। कई दिनों से भूखा होने के कारण वह इतना कमज़ोर हो गया है कि उसका पेट और पीठ पिचक कर एक हो गए हैं (अर्थात् वह हड्डियों का ढाँचा मात्र रह गया है)। कमज़ोरी के कारण वह सीधे खड़ा भी नहीं हो पा रहा है और लाठी (लकुटिया) के सहारे घिसट-घिसट कर चल रहा है। अपनी भूख मिटाने के लिए वह केवल मुट्ठी भर अनाज चाहता है, जिसके लिए वह अपनी पुरानी और फटी हुई झोली को लोगों के सामने फैला रहा है। उसकी यह बेबसी देखकर देखने वाले का कलेजा फट जाता है।

पद्यांश 2: भिक्षुक के बच्चों की करुणाजनक स्थिति

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,
बाएँ से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ाए।
भूख से सूख ओंठ जब जाते,
दाता—भाग्य-विधाता से क्या पाते?—
घूँट आँसुओं के पीकर रह जाते।

शब्दार्थ: दया-दृष्टि = दया भरी नज़र/भीख; दाता = भीख देने वाला; भाग्य-विधाता = ईश्वर।

प्रसंग: इस पद्यांश में कवि भिखारी के साथ-साथ उसके बच्चों की भूख और समाज की कठोरता का वर्णन कर रहे हैं।

भावार्थ: उस भिखारी के साथ उसके दो छोटे बच्चे भी हैं, जो हमेशा भीख माँगने के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाए रहते हैं। भूख के कारण पेट में उठने वाली ऐंठन को शांत करने के लिए वे अपने बाएँ हाथ से पेट मलते हुए चल रहे हैं, और दायाँ हाथ भीख (दया-दृष्टि) माँगने के लिए लोगों के सामने फैला रखा है। भयंकर भूख और प्यास के कारण उन बच्चों के होंठ सूख गए हैं। फिर भी, वे इस समाज के दान देने वालों (दाता) और अपने भाग्य-विधाता (ईश्वर) से कुछ नहीं पाते। समाज इतना संवेदनहीन है कि उन्हें भीख के रूप में अनाज का एक दाना भी नहीं मिलता। अंत में, निराश और भूखे होकर वे बेबस बच्चे अपने आँसुओं को ही पीकर (घूँट आँसुओं के पीकर) रह जाते हैं।

पद्यांश 3: समाज की संवेदनहीनता और कवि का संकल्प

चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।
ठहरो, अहो मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूँगा।
अभिमन्यु-जैसे हो सकोगे तुम,
तुम्हारे दुख मैं अपने हृदय में खींच लूँगा।

शब्दार्थ: जूठी पत्तल = फेंका हुआ खाना; अड़े हुए = तैयार/मुकाबले में खड़े; अमृत = प्रेम और संवेदना; अभिमन्यु = महाभारत का शूरवीर।

प्रसंग: इस अंतिम पद्यांश में समाज की क्रूरता का चरम बिंदु दिखाया गया है और कवि भिक्षुक के दुखों को हरने का संकल्प लेते हैं।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि भूख से व्याकुल होकर वे भिखारी सड़क पर पड़ी हुई दूसरों की जूठी पत्तलें (जूठा भोजन) चाटने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि समाज की क्रूरता यहीं खत्म नहीं होती, उन जूठी पत्तलों को भी छीनने के लिए कुत्ते उनके साथ संघर्ष कर रहे हैं (कुत्ते भी अड़े हुए हैं)। इंसान और जानवरों की यह लड़ाई देखकर कवि का हृदय करुणा और विद्रोह से भर उठता है। कवि उन्हें रोकते हुए कहते हैं—"ठहरो! मेरे हृदय में तुम्हारे लिए जो प्रेम, करुणा और संवेदना रूपी 'अमृत' है, मैं उसे तुम्हारे जीवन में सींच दूँगा।" कवि संकल्प लेते हैं कि मैं तुम्हारे सारे दुखों को अपने हृदय में खींच लूँगा (समाहित कर लूँगा) और तुम्हें 'अभिमन्यु' के समान वीर और स्वाभिमानी बनाऊँगा, ताकि तुम समाज के अन्याय और अपनी गरीबी के चक्रव्यूह को तोड़कर सम्मान से जी सको।

bhikshuk children

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्न (PYQs)

प्रश्न 1 'पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक' का क्या अर्थ है?
उत्तर: इस पंक्ति का अर्थ है कि भिखारी कई दिनों से भूखा है। लगातार भूखे रहने के कारण उसके शरीर का सारा माँस सूख गया है और वह केवल हड्डियों का ढाँचा बन गया है। उसकी स्थिति इतनी कमज़ोर है कि उसका पेट पिचक कर पीठ से जा लगा है, जिससे दोनों एक समान दिखाई दे रहे हैं। यह पंक्ति भिक्षुक की भयंकर भुखमरी को दर्शाती है।
प्रश्न 2 भिखारी के बच्चों की दयनीय स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर: भिखारी के दो बच्चे भी भूख से तड़प रहे हैं। पेट की भूख को दबाने के लिए वे अपने बाएँ हाथ से पेट मलते हुए चलते हैं और दायाँ हाथ लोगों के सामने भीख के लिए फैलाते हैं। भूख-प्यास से उनके होंठ सूख गए हैं। जब कोई उन्हें भीख नहीं देता, तो वे निराश होकर सड़क पर पड़ी जूठी पत्तलें चाटने को मजबूर हो जाते हैं, जहाँ कुत्तों के साथ भी उन्हें संघर्ष करना पड़ता है।
प्रश्न 3 कवि भिक्षुक और उसके बच्चों को 'अभिमन्यु' जैसा क्यों बनाना चाहते हैं?
उत्तर: महाभारत में 'अभिमन्यु' ने अकेले ही दुश्मनों के रचे हुए चक्रव्यूह को तोड़ा था और वीरता से लड़ा था। कवि भिक्षुक और उसके बच्चों को भीख माँगने वाली लाचार स्थिति से निकालकर उन्हें स्वाभिमानी और साहसी बनाना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि भिक्षुक समाज की इस संवेदनहीनता, गरीबी और अन्याय रूपी 'चक्रव्यूह' को तोड़कर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करे।